Friday, September 29, 2017

जनसंख्‍या विस्‍फोट : हादसों का बढ़ता सिलसिला


संभवत: चौथी या पांचवीं क्‍लास में तब मैं पढ़ रहा था जबकि अखबार की एक हेडिंग में जनसंख्‍या विस्‍फोट शब्‍द से सामना हुआ। तब पूछने पर मुझे समझाने की कोशिश की तो गई लेकिन पल्‍ले नहीं पड़ा। बाद में आगे की पढ़ाई के साथ यह जनसंख्‍या विस्‍फोट और उससे जुड़े कई लेख आदि पढ़ने सुनने को मिलते रहे। चूंकि मसला अपने देश में तेजी से बढ़ती आबादी से जुड़ा था तो उच्‍चशिक्षा के दौरान इसे लेकर जब तब जहां कुछ सामने आता पढ़ते-देखते हुए अधिक समझने की कोशिश करता। इस दौरान ही देश में कहीं दर्शन-पूजन तो कहीं मेले आदि के दौरान भगदड़ होने लगी और जानों के जाने का सिलसिला सामने आने लगा। रेलवे स्‍टेशनों की भी भगदड़ में मरने वालों के वाकये सामने आने लगे। अब व्‍यावहारिक तौर पर समझ में आने लगा कि जनसंख्‍या विस्‍फोट से सिर्फ मांग और आपूर्ति के बीच गहरी खाई ही नहीं बनेगी, सिर्फ संसाधनों की कमी ही नहीं आड़े आएगी, सिर्फ शहरों से लेकर सड़कों तक पर भीड़ ही नहीं बढ़ेगी बल्कि इंसान चींटियों की तरह कुचला जाएगा। अब भगदड़ का दौर बढ़ने लगा है। जो घटनाएं पहले साल में एकाध होती थीं अब दर्जनों हो जाती हैं। दशहरे के ठीक एक दिन पहले मुंबई के एलफिंस्‍टन रेलवे स्‍टेशन पर भी ऐसा ही हुआ। कोई घर को लौट रहा था तो कोई माया नगरी घूमने पहुंचा रहा होगा। न जाने कौन किस काम से जा रहा था और भगदड़ की भेंट चढ़ते हुए जान गंवा बैठा। हां, यह बेहद जरूरी है कि बढ़ती आबादी के मद्देनजर संसाधनाअों और सुविधाओं में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। लेकिन, इस हकीकत को भी स्‍वीकार करना होगा कि शहरों में आबादी ओवरफ्लो की सीमा से भी आगे बढ़ चुकी है। अब शहर बढ़ाए जाने से बात नहीं बनेगी बल्कि जहां से आबादी का पलायन होता है उन गांवों तक रोजगार के इंतजाम करने होंगे।

Friday, January 1, 2016

असहिष्णुता के बखेड़े को जवाब है अदनान की नागरिकता


पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी के भारतीय नागरिक होने का घटनाक्रम देश में वितंडा के रूप में खड़ी की गई कथित असहिष्णुता के लिए माकूल जवाब है। इस एक वाकये ने स्पष्ट संकेत भी दे दिए हैं कि जिन लोगों को भारत का माहौल अब रहने के लायक नहीं लगता उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। अदनान द्वारा भारतीय नागरिकता लिया जाना यह साबित करता है कि यहां की आबोहवा में अब भी सहिष्णुता उसी तरह से रची-बसी है जैसा कि इसका अतीत का संस्कार रहा है। नए साल का पहला दिन शाहरुख खान और आमिर खान जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं के लिए भी सबब है कि जिस देश उन्हें सिर माथे पर बिठाया उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बयानबाजी कर उन्होंने किस तरह का घिनौना कृत्य किया था। भारत का इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। जब एक पाकिस्तानी कलाकार भारत को खुद के लिए सबसे मुफीद और सुरक्षित देश पा रहा है तो भला यहां पैदा हुए पले-बढ़े और नाम-शोहरत कमाए इन कलाकारों को कहां से असुरक्षा की भावना छू गई या फिर देश का माहौल बिगड़ा हुआ लगा कि बेसिर-पैर की बात करने लगे। सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार अब वे साहित्यकार क्या करेंगे जो सिंडिकेट बनाकर अपनी-अपनी उल-जुलूल विचारों के काले अक्षरों से भरी किताबों को न सिर्फ अच्छे प्रकाशनों से छपवा लेते हैं बल्कि सिंडिकेटी की वजह से साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों पर भी डाका डाल देते हैं। वैसे ही साहित्यकारों की जमात ने असहिष्णुता का कृत्रिम माहौल तैयार कर पुरस्कार लौटाने का भी वितंडा किया। अच्छी बात यह रही है कि जिस काल में देश के माहौल को खराब घोषित करने की कोशिश हुई उसी दौर में एक पाकिस्तानी ने यहां की नागरिकता लेकर कई लोगों को अपने गिरेबां में झांकने की सीख भी दी है। अब इन बुद्धिजीवियों को सोचना होगा कि असहिष्णुता का हौव्वा खड़ा कर इन लोगों ने वैश्विक पटल पर देश की छवि खराब कर कौन सा स्वार्थ सिद्ध कर लिया है।

Friday, December 4, 2015

A great lesson for journalism by journalist kalpesh yagnik


चेन्नई में जब लोग बाढ़ से लड़ रहे हैं, सारा देश साथ खड़ा है-तब मैं ये कैसी पत्रकारिता कर रहा हूं?


पढ़ें कल्पेश याग्निक का कॉलम : ‘असंभव के विरुद्ध’

पत्रकारिता की दिशा बदलनी ही होगी। नौजवान पत्रकार बदलेंगे। वे अपने संपादकों को ही मना कर देंगे। कहेंगे कि नहीं, संकट के समय तो सिर्फ जांबाजों को दिखाएंगे। मुकाबला, साहस और मानवीय क्षमताओं को दिखाएंगे। पर्यावरण से छेड़खानी की खबरें बाद में देंगे और छेड़खानी करने भी नहीं देंगे। न अवैध निर्माण होने देंगे। वॉचडाॅग की तरह सब पर निगाह रखेंगे। धारा बदलेगी ही।
‘जानते हैं अभी तक ‘हिन्दुओं ने मुस्लिम बस्ती में दिया पहरा’, ‘मुसलमान भाइयों ने बहती हिन्दू बच्ची को बचाया’ -जैसी खबरी चेन्नई से क्यों नहीं आईं? क्योंकि न तो बचाने वालों के पास मीडिया को अपना परिचय देेने का समय है, न बचने वालों के पास। बाद में ढूंढ लाएंगे।
- एक निरपेक्ष कटाक्ष

महान् तमिल महाकाव्य सिलापतिकरम में पानी की प्रचंडता का वर्णन है। ‘रौद्र लहरों की ऊंचाई जैसे पहाड़ों के बराबर थी। धरती पर इकट्‌ठा हो - पानी जैसे गरजकर काले बादलों को छू रहा था।’

ये भयावहता कोई दो हजार वर्ष पहले महाकवि एलांगो अड़िंगल ने उक्त ग्रंथ में लिखी थी - जिसे तमिल साहित्य के सर्वश्रेष्ठ पांच महाकाव्यों में स्थान प्राप्त है। किसे पता था ऐसा ही कुछ दृश्य इस आधुनिक युग में, 21वीं सदी में अाएगा।

किन्तु चेन्नई वासियों ने समूचे संसार को दिखा दिया कि भीषण त्रासदी में डटे कैसे रहना। कैसे जीना। कैसे जीत जाना।
प्रथम भारतीय जो ठहरे- द्रविड़।

इसी तरह देश ने भी दिखा दिया। कि कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना किसे कहते हैं। सेना किसे कहते हैं।
किन्तु एक अपराध बोध मुझ में है। पत्रकार के रूप में।

और उसे करोड़ों पाठकों के कन्फेशन बॉक्स के सामने स्वीकार करने का साहस जुटा पाने का कारण है। कारण यह है कि मेरा भी दिल चेन्नई वासियों के लिए धड़कता है। मेरी भावनाएं भी उनके लिए उतनी ही अधिक हैं जितनी उन लोगों की जो वहां उनकी सहायता में अपने आप को झोंके हुए हैं। मैं भी इस महाजलप्लावन में समय पूर्व समाधि ले चुके अनेक माता-पिता, भाई-बहनों के दु:ख से हिला हुआ हूं। मैं, सारा मीडिया, सभी पत्रकार आपके लिए कुछ करना चाहतेे हैं।
किन्तु इतना कुछ चाहने के बावजूद, पत्रकार के रूप में मैंने यह क्या कर डाला? उसी अपराध की स्वीकारोक्ति।
1. मैंने पहले दिन तो इस भीषण अतिवृष्टि को कवर तक नहीं किया।

2. दूसरे दिन भी मैंने भारी वर्षा तो कवर की -किन्तु ‘नेशनल मीडिया’ में इसे अधिकतर ने पहले दिन प्रमुखता नहीं दी- यह कहकर बचता रहा।

3. फिर पत्रकारिता जाग गई। गंभीरता से। गहराई से।

4. इस बीच सोशल मीडिया ने पहले 24 घंटे मीडिया की चुप्पी पर तीखे प्रहार शुरू कर दिए। तब मेरी आंखें और खुलीं। चेन्नई के नागरिक सुजीत कुमार ने गिनाया कि इस दौरान मीडिया के लिए क्या प्राथमिकता रही (अ) कांग्रेस-भाजपा के बीच छापों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप, (ब) संसद में मंत्रियों के भाषण (स) आमिर खान का बयान उस पर बहस और (द) पूरा पिछला सप्ताह असहिष्णुता पर समाचार-विचार।

5. फिर मैंने देखा चेन्नई की त्रासदी पर समूचा राष्ट्र बात कर रहा है। कोने-कोने में महिलाएं फोन पर पारिवारिक बातें करते-करते चेन्नई में ऐसा हो गया, वो एक सड़क पूरी नदी बन गई, बच्ची को कितनी मेहनत से बचाया-ऐसी बातें करने लगीं।

जिस विषय पर महिलाएं बातें करने लगें - मीडिया के लिए सबसे बड़ा विषय वही होना चाहिए। पत्रकारिता ऐसा सिखाती है। क्योंकि महिलाएं उसी विषय पर बात करती हैं जो घर-घर की कहानी होगी। जो परिवार से जुड़ा होगा। जो बच्चों से संबंधित होगा। जिसमें भावना होगी। करुणा होगी। और पत्रकारिता इन्हीं मूल्यों का दर्पण है। यानी होना चाहिए।

तमिल भूमि चेर, पाण्ड्यन व चाेल राजाओं की भूमि है। कहते हैं चोल साम्राज्य का भव्य विस्तार का आधार सुशासन का एक अलग ही मूलमंत्र था। वे कहते थे यदि ब्याह कर लाई गई बहू प्रसन्न है - तो ही राजा व राज्य सफल है। चंूकि बहू दु:खी हुई तो घर में झगड़े होंगे। गृहकलह से त्रस्त श्वसुर घर के बाहर मिलने-बैठने वालों में रोष, क्रोध, कुंठा व्यक्त करेगा। फिर सभी ऐसा करने लगेंगे। नकारात्मकता फैलेगी। सभी अप्रसन्न रहने लगेंगे। इससे त्रस्त प्रजा, राजा व राज्य को कोसने लगेगी। इसलिए तब भारतवर्ष के अन्य क्षेत्रों में कहते थे बेटी की शादी तो चोल नेतृत्व वाले तमिल भूभाग पर बसे परिवारों में होनी चाहिए। वहां बहू को प्रसन्न रख, सभी खुश रहते हैं।

किन्तु यह तो विषय से हटना हो गया। बात मीडिया के रुझान की थी। फिर चेन्नई त्रासदी का व्यापक कवरेज शुरू हुआ।
6. किन्तु ट्विटर पर एक और तरह से अाक्रोश फूटा। लिखा गया: 
धन्यवाद। हमारे संकट को कवर करने का। छि। शेम ऑन यू।
किन्तु मेरा अपराध बोध यह नहीं है।

मुझे तो अपनी पत्रकारिता के पुरातन बने रहने का दु:ख है।
यानी जो किसी युग में मुझे मीडिया का विशेष काम लगता था - अाज भी मैं उसे ही ढो रहा हूं। जबकि पाठक-दर्शक-श्रोता कभी के आगे बढ़ गए हैं।
तो मेरे अपराधों की सूची यह है:
* खाने के पैकेट पहुंचाए जा रहे हैं - मैं इसके फोटो छाप रहा हूं। इसके फुटेज दिखा रहा हूं। इसके समाचार चला रहा हूं। क्यों? क्यों कर रहा हूं मैं ऐसा?

क्योंकि आज मैं स्वयं सोचता हूं कि यदि बाढ़ आ गई हो या भूकम्प या तूफान - मनुष्य का धर्म है कि वहां यदि पहुंचा सकता हो तो खाना पहुंचाए। यही सरकार का कर्तव्य है। सामाजिक संस्थाएं ऐसा करती ही हैं। भारतीय तो विश्व में साथ देने के लिए जाने ही जाते हैं।
फिर खाना पहुंचाना समाचार कैसे हुअा?
हां, एक छत पर बदहाल, फंसे परिवार ने सेना के हेलीकॉप्टर से पहुंचाए जा रहे पैकेट्स को और लेने से मना कर दिया। कहा - बाकी को भी देना है। उनके काम आएंगे।
ये दिखानी जरूरी है। जज़्बा जगाती है।
* सरकार ने ये नहीं किया, वो नहीं किया - मैं यह प्रश्न उठा रहा हूं। पुराने पापों का ब्योरा दिखा रहा हूं। क्यों? क्या हो जाएगा आज ऐसा दिखाने से?

क्योंकि आज मुझे समझना यह आवश्यक है कि अभी तात्कालिकता किस बात की है? सरकार की कमियां गिनाने की - या सब एकजुट हो -सहायता करें- इसकी।
हरिवंशराय बच्चन ने गहरा वार किया है -
किसने किया शर का संधान
कैसे हुआ शर का संधान
किस किस्म का है बाण...
अरे, ये सब बातें तो है बाद की
पहले तीर को तो निकाल
तीर... तीर... तीर पीर... पीर... पीर।
सचमुच चेन्नईवासी जिस भयंकर काल से जूझ रहे हैं - तब उनकी पीर, पीड़ा को दूर करने की जगह मैं तो कमियों के बारे में बात कर उन्हें और गहरे घाव ही तो दे रहा हूं।
* नदियों की जमीन पर, तालाबों पर, पोखर पर बड़ी-बड़ी अट्‌टालिकाएं तान दी गई हैं। खुली जमीनों पर कल-कारखाने लगा दिए गए हैं। पर्यावरण को भारी हानि पहुंचाई है। इसलिए बाढ़ आई चेन्नई में। ये बता रहा हूं मैं। क्यों?

समूचा संसार ऐसे तथ्यों को जानता है। कश्मीर की बाढ़ हो या बिहार की। उड़ीसा का तूफान हो या आंध्र का। या कि भीषण केदार त्रासदी। मैं यही, ऐसे ही प्रश्न पूरी ताकत से उठाता हूं। फिर? फिर भूल जाता हूं। कभी पीछे नहीं पड़ा। कि एक बार संकट से उबर जाएं - तो पुनर्वास का काम सही नीयत से हो। फिर सरकारी घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार के कारण पनपते अवैध निर्माणों व नदियों, मैदानों को निगलने पर पैनी दृष्टि रखूं। खोजपरक पत्रकारिता करूं। शोधपरक पत्रकारिता दिखाऊं। ऐसा कहां करता हूं मैं?

एक त्रासदी हुई। ये सब उठाया। फिर दूसरी त्रासदी तक सौहार्द्र। आज तक मुंबई में आई भीषण बाढ़ का कारण बनी मीठी नदी पर जो भी कुछ काम करना था कुछ भी नहीं हुआ है।
एक और बड़ा अपराध बोध।

जापान में सुनामी आई। आग लग गई। हमारा हेडलाइन था : जल से जला जापान। फिर मैंने खबर करवाई - पांच बातें जो हम जापान से सीख सकते हैं।
उसमें यही लिखा। कि देखिए जापान ने मदद के फोटो नहीं छापे। देखिए जापान ने ऐसा नहीं दिखाया। वैसा नहीं किया। वे देखिए तेज़ी से उबर गए।
फिर मैंने पेरिस हमले के बाद भी यही लिखा। कि देखिए पेरिस ने खून बहने के फोटो नहीं छापे। टीवी पर लाशों के ढेर नहीं दिखाए। आरोप-प्रत्यारोप नहीं बताए।
* विदेशों में हो - तो मुझे अच्छा लगता है। आदर्श लगता है। मेरे वतन में होते ही, अवसर संवेदना व संवेदनशीलता दिखाने का आते ही -मैं गांभीर्य त्याग कर- खाने के पैकेट ढूंढ़ने लगता हूं। कमियां, आरोप सब ले आता हूं।
अपने ट्विटर, फेसबुक, व्हॉट्सएप अकाउंट पर भी संयम के वीडियो तो विदेशी शेयर करता हूं - किन्तु अपनी मातृभूमि की या तो आलोचना, या निंदा या ताना या मखौल उड़ाता हूं।

चेन्नई की हर लड़ाई, हर संघर्ष समूचे देश का है। जो कुछ भी जिससे भी, जिस भी तरीके से करते बन रहा है - वो कर रहा है। कोई अच्छा सोच भी रहा है उनके लिए तो समझो कर रहा है।

किसी को भी इस समय ज़्यादा मदद या कम मदद वाली परिभाषा में लाना भूल होगी। क्योंकि संसार का सबसे निर्मम, निर्दयी और अकर्मण्य व्यक्ति भी यदि वहां हो या वहां से गुजर रहा हो - और कोई ऐसे संकट में दिखे -तो आपको क्या लगता है- वो मदद करेगा या नहीं? निश्चित करेगा। मनुष्य है। भारतीय है। मनुष्य ही मनुष्य के काम आता है।
चेन्नई त्रासदी से हम सभी ऐसी सीख ले सकेंगे, असंभव है। किन्तु लेनी ही होगी।
(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

Sunday, November 29, 2015

एक थे राजा हर्षवर्धन सर्वस्व दान देने वाले


प्राचीन भारत में हर्षवर्धन (590-647 ई.) वह अंतिम हिंदू सम्राट थे जिन्होंने पंजाब को छोड़कर शेष समस्त उत्तरी भारत पर राज्य किया था। उन्होंने अपना एक सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया था। राजा हर्षवर्धन के एक तथ्य से बहुत कम ही लोग परिचित हैं। वर्तमान में वारेन बफेट को दुनिया की ऐसी हस्ती के रूप में जाना जाता है जिसने अब तक दो बार अपनी पूरी संपत्ति को दान कर फिर से खुद को मिल्कियत का बादशाह साबित किया है। एक ऐसा इंसान जो कि संपत्ति के मामले में शीर्षस्थ होने के बावजूद सबकुछ दान देकर जीरो से शुरुआत कर फिर से वही मुकाम हासिल करने की क्षमता रखता हो। चूंकि पूर्व की ऐसी किसी घटना के बारे में जाना-सुना नहीं था इसलिए यह हतप्रभ करने वाली बात थी कि आखिर कैसे कोई इतना जोखिम भरा कदम उठा सकता है कि अपना सर्वस्व दान देकर फिर से उससे भी अधिक दौलत कमा ले। अभी कुछ वर्षों से इस चमत्कृत वाकये को लेकर उधेड़बुन चल ही रही थी कि देश में एनेस्थिया के क्षेत्र के बड़े नाम डा. एकराम लाल से मुलाकात हुई। वह सेवानिवृत्ति के बाद इन दिनों आराम करते हुए भी आराम नहीं कर रहे हैं। सेमिनार आदि में शिरकत करते हैं। किताबें लिखने में व्यस्त हैं। एक किताब लिखने के दौरान ही अपने अनुसंधान में उन्होंने राजा हर्षवर्धन का भी जिक्र किया। इसका जिक्र किताब में नहीं है बल्कि उन्होंने बातचीत के दौरान बताया। बताते हैं कि राजा हर्षवर्धन ऐसे सम्राट थे जो प्रति वर्ष वह काम किया करते थे जो साहस अभी तक वारेन बफेट ने दो बार कर दिखाया है। दरअसल राजा हर्षवर्धन प्रत्येक वर्ष अपने राजकोष का पूरा खजाना लेकर चलते थे और प्रयाग तक आते-आते दान कर देते थे। उस कोष का अधिकांश हिस्सा प्रयाग में ही दान किया जाता था। समूचा राजकोष दान दिया जाता था वह भी प्रति वर्ष। प्रयाग से लौटने के बाद राजा हर्षवर्धन फिर से अपने राज्य क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व से राजकोष को भरते-बढ़ाते और राज चलाते थे।
अब इस तथ्य की वास्तविकता को चुनौती दी जा सकती है। चूंकि इतिहासकारों ने प्रमुखता से इस बात का उल्लेख कहीं नहीं किया है लिहाजा 'किंतु-परंतुÓ किया जा सकता है। यहां यह भी जिक्र कर दें कि डा. लाल ने जो तथ्य बताया उसका प्रसंग उन्होंने उन वशंजों से पुख्ता किया है जिनके पूर्वज राजा हर्षवर्धन के साथ रहा करते थे। ऐसे ही वंशजों में से एक थे खुद डा. लाल के पूर्वज भी जो बाद में प्रयाग के समीप खुद राजा हर्षवर्धन द्वारा बसाए गए थे।

Wednesday, August 19, 2015