पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी के भारतीय नागरिक होने का घटनाक्रम देश में वितंडा के रूप में खड़ी की गई कथित असहिष्णुता के लिए माकूल जवाब है। इस एक वाकये ने स्पष्ट संकेत भी दे दिए हैं कि जिन लोगों को भारत का माहौल अब रहने के लायक नहीं लगता उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। अदनान द्वारा भारतीय नागरिकता लिया जाना यह साबित करता है कि यहां की आबोहवा में अब भी सहिष्णुता उसी तरह से रची-बसी है जैसा कि इसका अतीत का संस्कार रहा है। नए साल का पहला दिन शाहरुख खान और आमिर खान जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं के लिए भी सबब है कि जिस देश उन्हें सिर माथे पर बिठाया उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बयानबाजी कर उन्होंने किस तरह का घिनौना कृत्य किया था। भारत का इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। जब एक पाकिस्तानी कलाकार भारत को खुद के लिए सबसे मुफीद और सुरक्षित देश पा रहा है तो भला यहां पैदा हुए पले-बढ़े और नाम-शोहरत कमाए इन कलाकारों को कहां से असुरक्षा की भावना छू गई या फिर देश का माहौल बिगड़ा हुआ लगा कि बेसिर-पैर की बात करने लगे। सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार अब वे साहित्यकार क्या करेंगे जो सिंडिकेट बनाकर अपनी-अपनी उल-जुलूल विचारों के काले अक्षरों से भरी किताबों को न सिर्फ अच्छे प्रकाशनों से छपवा लेते हैं बल्कि सिंडिकेटी की वजह से साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों पर भी डाका डाल देते हैं। वैसे ही साहित्यकारों की जमात ने असहिष्णुता का कृत्रिम माहौल तैयार कर पुरस्कार लौटाने का भी वितंडा किया। अच्छी बात यह रही है कि जिस काल में देश के माहौल को खराब घोषित करने की कोशिश हुई उसी दौर में एक पाकिस्तानी ने यहां की नागरिकता लेकर कई लोगों को अपने गिरेबां में झांकने की सीख भी दी है। अब इन बुद्धिजीवियों को सोचना होगा कि असहिष्णुता का हौव्वा खड़ा कर इन लोगों ने वैश्विक पटल पर देश की छवि खराब कर कौन सा स्वार्थ सिद्ध कर लिया है।
Friday, January 1, 2016
असहिष्णुता के बखेड़े को जवाब है अदनान की नागरिकता
पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी के भारतीय नागरिक होने का घटनाक्रम देश में वितंडा के रूप में खड़ी की गई कथित असहिष्णुता के लिए माकूल जवाब है। इस एक वाकये ने स्पष्ट संकेत भी दे दिए हैं कि जिन लोगों को भारत का माहौल अब रहने के लायक नहीं लगता उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। अदनान द्वारा भारतीय नागरिकता लिया जाना यह साबित करता है कि यहां की आबोहवा में अब भी सहिष्णुता उसी तरह से रची-बसी है जैसा कि इसका अतीत का संस्कार रहा है। नए साल का पहला दिन शाहरुख खान और आमिर खान जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं के लिए भी सबब है कि जिस देश उन्हें सिर माथे पर बिठाया उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बयानबाजी कर उन्होंने किस तरह का घिनौना कृत्य किया था। भारत का इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। जब एक पाकिस्तानी कलाकार भारत को खुद के लिए सबसे मुफीद और सुरक्षित देश पा रहा है तो भला यहां पैदा हुए पले-बढ़े और नाम-शोहरत कमाए इन कलाकारों को कहां से असुरक्षा की भावना छू गई या फिर देश का माहौल बिगड़ा हुआ लगा कि बेसिर-पैर की बात करने लगे। सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार अब वे साहित्यकार क्या करेंगे जो सिंडिकेट बनाकर अपनी-अपनी उल-जुलूल विचारों के काले अक्षरों से भरी किताबों को न सिर्फ अच्छे प्रकाशनों से छपवा लेते हैं बल्कि सिंडिकेटी की वजह से साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों पर भी डाका डाल देते हैं। वैसे ही साहित्यकारों की जमात ने असहिष्णुता का कृत्रिम माहौल तैयार कर पुरस्कार लौटाने का भी वितंडा किया। अच्छी बात यह रही है कि जिस काल में देश के माहौल को खराब घोषित करने की कोशिश हुई उसी दौर में एक पाकिस्तानी ने यहां की नागरिकता लेकर कई लोगों को अपने गिरेबां में झांकने की सीख भी दी है। अब इन बुद्धिजीवियों को सोचना होगा कि असहिष्णुता का हौव्वा खड़ा कर इन लोगों ने वैश्विक पटल पर देश की छवि खराब कर कौन सा स्वार्थ सिद्ध कर लिया है।
Friday, December 4, 2015
A great lesson for journalism by journalist kalpesh yagnik
चेन्नई में जब लोग बाढ़ से लड़ रहे हैं, सारा देश साथ खड़ा है-तब मैं ये कैसी पत्रकारिता कर रहा हूं?
पढ़ें कल्पेश याग्निक का कॉलम : ‘असंभव के विरुद्ध’
पत्रकारिता
की दिशा बदलनी ही होगी। नौजवान पत्रकार बदलेंगे। वे अपने संपादकों को ही
मना कर देंगे। कहेंगे कि नहीं, संकट के समय तो सिर्फ जांबाजों को दिखाएंगे।
मुकाबला, साहस और मानवीय क्षमताओं को दिखाएंगे। पर्यावरण से छेड़खानी की
खबरें बाद में देंगे और छेड़खानी करने भी नहीं देंगे। न अवैध निर्माण होने
देंगे। वॉचडाॅग की तरह सब पर निगाह रखेंगे। धारा बदलेगी ही।
महान् तमिल महाकाव्य सिलापतिकरम में पानी की प्रचंडता का वर्णन है। ‘रौद्र लहरों की ऊंचाई जैसे पहाड़ों के बराबर थी। धरती पर इकट्ठा हो - पानी जैसे गरजकर काले बादलों को छू रहा था।’
ये भयावहता कोई दो हजार वर्ष पहले महाकवि एलांगो अड़िंगल ने उक्त ग्रंथ में लिखी थी - जिसे तमिल साहित्य के सर्वश्रेष्ठ पांच महाकाव्यों में स्थान प्राप्त है। किसे पता था ऐसा ही कुछ दृश्य इस आधुनिक युग में, 21वीं सदी में अाएगा।
किन्तु चेन्नई वासियों ने समूचे संसार को दिखा दिया कि भीषण त्रासदी में डटे कैसे रहना। कैसे जीना। कैसे जीत जाना।
प्रथम भारतीय जो ठहरे- द्रविड़।
इसी तरह देश ने भी दिखा दिया। कि कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना किसे कहते हैं। सेना किसे कहते हैं।
किन्तु एक अपराध बोध मुझ में है। पत्रकार के रूप में।
और उसे करोड़ों पाठकों के कन्फेशन बॉक्स के सामने स्वीकार करने का साहस जुटा पाने का कारण है। कारण यह है कि मेरा भी दिल चेन्नई वासियों के लिए धड़कता है। मेरी भावनाएं भी उनके लिए उतनी ही अधिक हैं जितनी उन लोगों की जो वहां उनकी सहायता में अपने आप को झोंके हुए हैं। मैं भी इस महाजलप्लावन में समय पूर्व समाधि ले चुके अनेक माता-पिता, भाई-बहनों के दु:ख से हिला हुआ हूं। मैं, सारा मीडिया, सभी पत्रकार आपके लिए कुछ करना चाहतेे हैं।
2. दूसरे दिन भी मैंने भारी वर्षा तो कवर की -किन्तु ‘नेशनल मीडिया’ में इसे अधिकतर ने पहले दिन प्रमुखता नहीं दी- यह कहकर बचता रहा।
3. फिर पत्रकारिता जाग गई। गंभीरता से। गहराई से।
4. इस बीच सोशल मीडिया ने पहले 24 घंटे मीडिया की चुप्पी पर तीखे प्रहार शुरू कर दिए। तब मेरी आंखें और खुलीं। चेन्नई के नागरिक सुजीत कुमार ने गिनाया कि इस दौरान मीडिया के लिए क्या प्राथमिकता रही (अ) कांग्रेस-भाजपा के बीच छापों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप, (ब) संसद में मंत्रियों के भाषण (स) आमिर खान का बयान उस पर बहस और (द) पूरा पिछला सप्ताह असहिष्णुता पर समाचार-विचार।
5. फिर मैंने देखा चेन्नई की त्रासदी पर समूचा राष्ट्र बात कर रहा है। कोने-कोने में महिलाएं फोन पर पारिवारिक बातें करते-करते चेन्नई में ऐसा हो गया, वो एक सड़क पूरी नदी बन गई, बच्ची को कितनी मेहनत से बचाया-ऐसी बातें करने लगीं।
जिस विषय पर महिलाएं बातें करने लगें - मीडिया के लिए सबसे बड़ा विषय वही होना चाहिए। पत्रकारिता ऐसा सिखाती है। क्योंकि महिलाएं उसी विषय पर बात करती हैं जो घर-घर की कहानी होगी। जो परिवार से जुड़ा होगा। जो बच्चों से संबंधित होगा। जिसमें भावना होगी। करुणा होगी। और पत्रकारिता इन्हीं मूल्यों का दर्पण है। यानी होना चाहिए।
तमिल भूमि चेर, पाण्ड्यन व चाेल राजाओं की भूमि है। कहते हैं चोल साम्राज्य का भव्य विस्तार का आधार सुशासन का एक अलग ही मूलमंत्र था। वे कहते थे यदि ब्याह कर लाई गई बहू प्रसन्न है - तो ही राजा व राज्य सफल है। चंूकि बहू दु:खी हुई तो घर में झगड़े होंगे। गृहकलह से त्रस्त श्वसुर घर के बाहर मिलने-बैठने वालों में रोष, क्रोध, कुंठा व्यक्त करेगा। फिर सभी ऐसा करने लगेंगे। नकारात्मकता फैलेगी। सभी अप्रसन्न रहने लगेंगे। इससे त्रस्त प्रजा, राजा व राज्य को कोसने लगेगी। इसलिए तब भारतवर्ष के अन्य क्षेत्रों में कहते थे बेटी की शादी तो चोल नेतृत्व वाले तमिल भूभाग पर बसे परिवारों में होनी चाहिए। वहां बहू को प्रसन्न रख, सभी खुश रहते हैं।
किन्तु यह तो विषय से हटना हो गया। बात मीडिया के रुझान की थी। फिर चेन्नई त्रासदी का व्यापक कवरेज शुरू हुआ।
6. किन्तु ट्विटर पर एक और तरह से अाक्रोश फूटा। लिखा गया:
धन्यवाद। हमारे संकट को कवर करने का। छि। शेम ऑन यू।
किन्तु मेरा अपराध बोध यह नहीं है।
मुझे तो अपनी पत्रकारिता के पुरातन बने रहने का दु:ख है।
यानी जो किसी युग में मुझे मीडिया का विशेष काम लगता था - अाज भी मैं उसे ही ढो रहा हूं। जबकि पाठक-दर्शक-श्रोता कभी के आगे बढ़ गए हैं।
तो मेरे अपराधों की सूची यह है:
क्योंकि आज मैं स्वयं सोचता हूं कि यदि बाढ़ आ गई हो या भूकम्प या तूफान - मनुष्य का धर्म है कि वहां यदि पहुंचा सकता हो तो खाना पहुंचाए। यही सरकार का कर्तव्य है। सामाजिक संस्थाएं ऐसा करती ही हैं। भारतीय तो विश्व में साथ देने के लिए जाने ही जाते हैं।
फिर खाना पहुंचाना समाचार कैसे हुअा?
क्योंकि आज मुझे समझना यह आवश्यक है कि अभी तात्कालिकता किस बात की है? सरकार की कमियां गिनाने की - या सब एकजुट हो -सहायता करें- इसकी।
समूचा संसार ऐसे तथ्यों को जानता है। कश्मीर की बाढ़ हो या बिहार की। उड़ीसा का तूफान हो या आंध्र का। या कि भीषण केदार त्रासदी। मैं यही, ऐसे ही प्रश्न पूरी ताकत से उठाता हूं। फिर? फिर भूल जाता हूं। कभी पीछे नहीं पड़ा। कि एक बार संकट से उबर जाएं - तो पुनर्वास का काम सही नीयत से हो। फिर सरकारी घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार के कारण पनपते अवैध निर्माणों व नदियों, मैदानों को निगलने पर पैनी दृष्टि रखूं। खोजपरक पत्रकारिता करूं। शोधपरक पत्रकारिता दिखाऊं। ऐसा कहां करता हूं मैं?
एक त्रासदी हुई। ये सब उठाया। फिर दूसरी त्रासदी तक सौहार्द्र। आज तक मुंबई में आई भीषण बाढ़ का कारण बनी मीठी नदी पर जो भी कुछ काम करना था कुछ भी नहीं हुआ है।
एक और बड़ा अपराध बोध।
जापान में सुनामी आई। आग लग गई। हमारा हेडलाइन था : जल से जला जापान। फिर मैंने खबर करवाई - पांच बातें जो हम जापान से सीख सकते हैं।
उसमें यही लिखा। कि देखिए जापान ने मदद के फोटो नहीं छापे। देखिए जापान ने ऐसा नहीं दिखाया। वैसा नहीं किया। वे देखिए तेज़ी से उबर गए।
फिर मैंने पेरिस हमले के बाद भी यही लिखा। कि देखिए पेरिस ने खून बहने के फोटो नहीं छापे। टीवी पर लाशों के ढेर नहीं दिखाए। आरोप-प्रत्यारोप नहीं बताए।
चेन्नई की हर लड़ाई, हर संघर्ष समूचे देश का है। जो कुछ भी जिससे भी, जिस भी तरीके से करते बन रहा है - वो कर रहा है। कोई अच्छा सोच भी रहा है उनके लिए तो समझो कर रहा है।
किसी को भी इस समय ज़्यादा मदद या कम मदद वाली परिभाषा में लाना भूल होगी। क्योंकि संसार का सबसे निर्मम, निर्दयी और अकर्मण्य व्यक्ति भी यदि वहां हो या वहां से गुजर रहा हो - और कोई ऐसे संकट में दिखे -तो आपको क्या लगता है- वो मदद करेगा या नहीं? निश्चित करेगा। मनुष्य है। भारतीय है। मनुष्य ही मनुष्य के काम आता है।
‘जानते
हैं अभी तक ‘हिन्दुओं ने मुस्लिम बस्ती में दिया पहरा’, ‘मुसलमान भाइयों
ने बहती हिन्दू बच्ची को बचाया’ -जैसी खबरी चेन्नई से क्यों नहीं आईं?
क्योंकि न तो बचाने वालों के पास मीडिया को अपना परिचय देेने का समय है, न
बचने वालों के पास। बाद में ढूंढ लाएंगे।
- एक निरपेक्ष कटाक्ष
- एक निरपेक्ष कटाक्ष
महान् तमिल महाकाव्य सिलापतिकरम में पानी की प्रचंडता का वर्णन है। ‘रौद्र लहरों की ऊंचाई जैसे पहाड़ों के बराबर थी। धरती पर इकट्ठा हो - पानी जैसे गरजकर काले बादलों को छू रहा था।’
ये भयावहता कोई दो हजार वर्ष पहले महाकवि एलांगो अड़िंगल ने उक्त ग्रंथ में लिखी थी - जिसे तमिल साहित्य के सर्वश्रेष्ठ पांच महाकाव्यों में स्थान प्राप्त है। किसे पता था ऐसा ही कुछ दृश्य इस आधुनिक युग में, 21वीं सदी में अाएगा।
किन्तु चेन्नई वासियों ने समूचे संसार को दिखा दिया कि भीषण त्रासदी में डटे कैसे रहना। कैसे जीना। कैसे जीत जाना।
प्रथम भारतीय जो ठहरे- द्रविड़।
इसी तरह देश ने भी दिखा दिया। कि कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना किसे कहते हैं। सेना किसे कहते हैं।
किन्तु एक अपराध बोध मुझ में है। पत्रकार के रूप में।
और उसे करोड़ों पाठकों के कन्फेशन बॉक्स के सामने स्वीकार करने का साहस जुटा पाने का कारण है। कारण यह है कि मेरा भी दिल चेन्नई वासियों के लिए धड़कता है। मेरी भावनाएं भी उनके लिए उतनी ही अधिक हैं जितनी उन लोगों की जो वहां उनकी सहायता में अपने आप को झोंके हुए हैं। मैं भी इस महाजलप्लावन में समय पूर्व समाधि ले चुके अनेक माता-पिता, भाई-बहनों के दु:ख से हिला हुआ हूं। मैं, सारा मीडिया, सभी पत्रकार आपके लिए कुछ करना चाहतेे हैं।
किन्तु इतना कुछ चाहने के बावजूद, पत्रकार के रूप में मैंने यह क्या कर डाला? उसी अपराध की स्वीकारोक्ति।
1. मैंने पहले दिन तो इस भीषण अतिवृष्टि को कवर तक नहीं किया।
1. मैंने पहले दिन तो इस भीषण अतिवृष्टि को कवर तक नहीं किया।
2. दूसरे दिन भी मैंने भारी वर्षा तो कवर की -किन्तु ‘नेशनल मीडिया’ में इसे अधिकतर ने पहले दिन प्रमुखता नहीं दी- यह कहकर बचता रहा।
3. फिर पत्रकारिता जाग गई। गंभीरता से। गहराई से।
4. इस बीच सोशल मीडिया ने पहले 24 घंटे मीडिया की चुप्पी पर तीखे प्रहार शुरू कर दिए। तब मेरी आंखें और खुलीं। चेन्नई के नागरिक सुजीत कुमार ने गिनाया कि इस दौरान मीडिया के लिए क्या प्राथमिकता रही (अ) कांग्रेस-भाजपा के बीच छापों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप, (ब) संसद में मंत्रियों के भाषण (स) आमिर खान का बयान उस पर बहस और (द) पूरा पिछला सप्ताह असहिष्णुता पर समाचार-विचार।
5. फिर मैंने देखा चेन्नई की त्रासदी पर समूचा राष्ट्र बात कर रहा है। कोने-कोने में महिलाएं फोन पर पारिवारिक बातें करते-करते चेन्नई में ऐसा हो गया, वो एक सड़क पूरी नदी बन गई, बच्ची को कितनी मेहनत से बचाया-ऐसी बातें करने लगीं।
जिस विषय पर महिलाएं बातें करने लगें - मीडिया के लिए सबसे बड़ा विषय वही होना चाहिए। पत्रकारिता ऐसा सिखाती है। क्योंकि महिलाएं उसी विषय पर बात करती हैं जो घर-घर की कहानी होगी। जो परिवार से जुड़ा होगा। जो बच्चों से संबंधित होगा। जिसमें भावना होगी। करुणा होगी। और पत्रकारिता इन्हीं मूल्यों का दर्पण है। यानी होना चाहिए।
तमिल भूमि चेर, पाण्ड्यन व चाेल राजाओं की भूमि है। कहते हैं चोल साम्राज्य का भव्य विस्तार का आधार सुशासन का एक अलग ही मूलमंत्र था। वे कहते थे यदि ब्याह कर लाई गई बहू प्रसन्न है - तो ही राजा व राज्य सफल है। चंूकि बहू दु:खी हुई तो घर में झगड़े होंगे। गृहकलह से त्रस्त श्वसुर घर के बाहर मिलने-बैठने वालों में रोष, क्रोध, कुंठा व्यक्त करेगा। फिर सभी ऐसा करने लगेंगे। नकारात्मकता फैलेगी। सभी अप्रसन्न रहने लगेंगे। इससे त्रस्त प्रजा, राजा व राज्य को कोसने लगेगी। इसलिए तब भारतवर्ष के अन्य क्षेत्रों में कहते थे बेटी की शादी तो चोल नेतृत्व वाले तमिल भूभाग पर बसे परिवारों में होनी चाहिए। वहां बहू को प्रसन्न रख, सभी खुश रहते हैं।
किन्तु यह तो विषय से हटना हो गया। बात मीडिया के रुझान की थी। फिर चेन्नई त्रासदी का व्यापक कवरेज शुरू हुआ।
6. किन्तु ट्विटर पर एक और तरह से अाक्रोश फूटा। लिखा गया:
धन्यवाद। हमारे संकट को कवर करने का। छि। शेम ऑन यू।
किन्तु मेरा अपराध बोध यह नहीं है।
मुझे तो अपनी पत्रकारिता के पुरातन बने रहने का दु:ख है।
यानी जो किसी युग में मुझे मीडिया का विशेष काम लगता था - अाज भी मैं उसे ही ढो रहा हूं। जबकि पाठक-दर्शक-श्रोता कभी के आगे बढ़ गए हैं।
तो मेरे अपराधों की सूची यह है:
*
खाने के पैकेट पहुंचाए जा रहे हैं - मैं इसके फोटो छाप रहा हूं। इसके
फुटेज दिखा रहा हूं। इसके समाचार चला रहा हूं। क्यों? क्यों कर रहा हूं मैं
ऐसा?
क्योंकि आज मैं स्वयं सोचता हूं कि यदि बाढ़ आ गई हो या भूकम्प या तूफान - मनुष्य का धर्म है कि वहां यदि पहुंचा सकता हो तो खाना पहुंचाए। यही सरकार का कर्तव्य है। सामाजिक संस्थाएं ऐसा करती ही हैं। भारतीय तो विश्व में साथ देने के लिए जाने ही जाते हैं।
फिर खाना पहुंचाना समाचार कैसे हुअा?
हां,
एक छत पर बदहाल, फंसे परिवार ने सेना के हेलीकॉप्टर से पहुंचाए जा रहे
पैकेट्स को और लेने से मना कर दिया। कहा - बाकी को भी देना है। उनके काम
आएंगे।
ये दिखानी जरूरी है। जज़्बा जगाती है।
ये दिखानी जरूरी है। जज़्बा जगाती है।
*
सरकार ने ये नहीं किया, वो नहीं किया - मैं यह प्रश्न उठा रहा हूं। पुराने
पापों का ब्योरा दिखा रहा हूं। क्यों? क्या हो जाएगा आज ऐसा दिखाने से?
क्योंकि आज मुझे समझना यह आवश्यक है कि अभी तात्कालिकता किस बात की है? सरकार की कमियां गिनाने की - या सब एकजुट हो -सहायता करें- इसकी।
हरिवंशराय बच्चन ने गहरा वार किया है -
किसने किया शर का संधान
कैसे हुआ शर का संधान
किस किस्म का है बाण...
अरे, ये सब बातें तो है बाद की
पहले तीर को तो निकाल
तीर... तीर... तीर पीर... पीर... पीर।
किसने किया शर का संधान
कैसे हुआ शर का संधान
किस किस्म का है बाण...
अरे, ये सब बातें तो है बाद की
पहले तीर को तो निकाल
तीर... तीर... तीर पीर... पीर... पीर।
सचमुच
चेन्नईवासी जिस भयंकर काल से जूझ रहे हैं - तब उनकी पीर, पीड़ा को दूर करने
की जगह मैं तो कमियों के बारे में बात कर उन्हें और गहरे घाव ही तो दे रहा
हूं।
*
नदियों की जमीन पर, तालाबों पर, पोखर पर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं तान दी गई
हैं। खुली जमीनों पर कल-कारखाने लगा दिए गए हैं। पर्यावरण को भारी हानि
पहुंचाई है। इसलिए बाढ़ आई चेन्नई में। ये बता रहा हूं मैं। क्यों?
समूचा संसार ऐसे तथ्यों को जानता है। कश्मीर की बाढ़ हो या बिहार की। उड़ीसा का तूफान हो या आंध्र का। या कि भीषण केदार त्रासदी। मैं यही, ऐसे ही प्रश्न पूरी ताकत से उठाता हूं। फिर? फिर भूल जाता हूं। कभी पीछे नहीं पड़ा। कि एक बार संकट से उबर जाएं - तो पुनर्वास का काम सही नीयत से हो। फिर सरकारी घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार के कारण पनपते अवैध निर्माणों व नदियों, मैदानों को निगलने पर पैनी दृष्टि रखूं। खोजपरक पत्रकारिता करूं। शोधपरक पत्रकारिता दिखाऊं। ऐसा कहां करता हूं मैं?
एक त्रासदी हुई। ये सब उठाया। फिर दूसरी त्रासदी तक सौहार्द्र। आज तक मुंबई में आई भीषण बाढ़ का कारण बनी मीठी नदी पर जो भी कुछ काम करना था कुछ भी नहीं हुआ है।
एक और बड़ा अपराध बोध।
जापान में सुनामी आई। आग लग गई। हमारा हेडलाइन था : जल से जला जापान। फिर मैंने खबर करवाई - पांच बातें जो हम जापान से सीख सकते हैं।
उसमें यही लिखा। कि देखिए जापान ने मदद के फोटो नहीं छापे। देखिए जापान ने ऐसा नहीं दिखाया। वैसा नहीं किया। वे देखिए तेज़ी से उबर गए।
फिर मैंने पेरिस हमले के बाद भी यही लिखा। कि देखिए पेरिस ने खून बहने के फोटो नहीं छापे। टीवी पर लाशों के ढेर नहीं दिखाए। आरोप-प्रत्यारोप नहीं बताए।
* विदेशों में हो - तो मुझे अच्छा लगता है। आदर्श लगता है। मेरे
वतन में होते ही, अवसर संवेदना व संवेदनशीलता दिखाने का आते ही -मैं
गांभीर्य त्याग कर- खाने के पैकेट ढूंढ़ने लगता हूं। कमियां, आरोप सब ले आता
हूं।
अपने ट्विटर, फेसबुक, व्हॉट्सएप अकाउंट पर भी संयम के वीडियो तो विदेशी शेयर करता हूं - किन्तु अपनी मातृभूमि की या तो आलोचना, या निंदा या ताना या मखौल उड़ाता हूं।
चेन्नई की हर लड़ाई, हर संघर्ष समूचे देश का है। जो कुछ भी जिससे भी, जिस भी तरीके से करते बन रहा है - वो कर रहा है। कोई अच्छा सोच भी रहा है उनके लिए तो समझो कर रहा है।
किसी को भी इस समय ज़्यादा मदद या कम मदद वाली परिभाषा में लाना भूल होगी। क्योंकि संसार का सबसे निर्मम, निर्दयी और अकर्मण्य व्यक्ति भी यदि वहां हो या वहां से गुजर रहा हो - और कोई ऐसे संकट में दिखे -तो आपको क्या लगता है- वो मदद करेगा या नहीं? निश्चित करेगा। मनुष्य है। भारतीय है। मनुष्य ही मनुष्य के काम आता है।
चेन्नई त्रासदी से हम सभी ऐसी सीख ले सकेंगे, असंभव है। किन्तु लेनी ही होगी।
(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)
Sunday, November 29, 2015
एक थे राजा हर्षवर्धन सर्वस्व दान देने वाले
प्राचीन भारत में हर्षवर्धन (590-647 ई.) वह अंतिम हिंदू सम्राट थे जिन्होंने पंजाब को छोड़कर शेष समस्त उत्तरी भारत पर राज्य किया था। उन्होंने अपना एक सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया था। राजा हर्षवर्धन के एक तथ्य से बहुत कम ही लोग परिचित हैं। वर्तमान में वारेन बफेट को दुनिया की ऐसी हस्ती के रूप में जाना जाता है जिसने अब तक दो बार अपनी पूरी संपत्ति को दान कर फिर से खुद को मिल्कियत का बादशाह साबित किया है। एक ऐसा इंसान जो कि संपत्ति के मामले में शीर्षस्थ होने के बावजूद सबकुछ दान देकर जीरो से शुरुआत कर फिर से वही मुकाम हासिल करने की क्षमता रखता हो। चूंकि पूर्व की ऐसी किसी घटना के बारे में जाना-सुना नहीं था इसलिए यह हतप्रभ करने वाली बात थी कि आखिर कैसे कोई इतना जोखिम भरा कदम उठा सकता है कि अपना सर्वस्व दान देकर फिर से उससे भी अधिक दौलत कमा ले। अभी कुछ वर्षों से इस चमत्कृत वाकये को लेकर उधेड़बुन चल ही रही थी कि देश में एनेस्थिया के क्षेत्र के बड़े नाम डा. एकराम लाल से मुलाकात हुई। वह सेवानिवृत्ति के बाद इन दिनों आराम करते हुए भी आराम नहीं कर रहे हैं। सेमिनार आदि में शिरकत करते हैं। किताबें लिखने में व्यस्त हैं। एक किताब लिखने के दौरान ही अपने अनुसंधान में उन्होंने राजा हर्षवर्धन का भी जिक्र किया। इसका जिक्र किताब में नहीं है बल्कि उन्होंने बातचीत के दौरान बताया। बताते हैं कि राजा हर्षवर्धन ऐसे सम्राट थे जो प्रति वर्ष वह काम किया करते थे जो साहस अभी तक वारेन बफेट ने दो बार कर दिखाया है। दरअसल राजा हर्षवर्धन प्रत्येक वर्ष अपने राजकोष का पूरा खजाना लेकर चलते थे और प्रयाग तक आते-आते दान कर देते थे। उस कोष का अधिकांश हिस्सा प्रयाग में ही दान किया जाता था। समूचा राजकोष दान दिया जाता था वह भी प्रति वर्ष। प्रयाग से लौटने के बाद राजा हर्षवर्धन फिर से अपने राज्य क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व से राजकोष को भरते-बढ़ाते और राज चलाते थे।
अब इस तथ्य की वास्तविकता को चुनौती दी जा सकती है। चूंकि इतिहासकारों ने प्रमुखता से इस बात का उल्लेख कहीं नहीं किया है लिहाजा 'किंतु-परंतुÓ किया जा सकता है। यहां यह भी जिक्र कर दें कि डा. लाल ने जो तथ्य बताया उसका प्रसंग उन्होंने उन वशंजों से पुख्ता किया है जिनके पूर्वज राजा हर्षवर्धन के साथ रहा करते थे। ऐसे ही वंशजों में से एक थे खुद डा. लाल के पूर्वज भी जो बाद में प्रयाग के समीप खुद राजा हर्षवर्धन द्वारा बसाए गए थे।
Tuesday, November 10, 2015
Wednesday, August 19, 2015
Tuesday, July 21, 2015
Thursday, March 28, 2013
बाबा की नगरी की अडभंगी होली
बनारस का असली रस है यहाँ की होली .....जिसके अद्भुत रंग जब बरसते है तो हर शख्स रंगीन नज़र आता है ! कुछ बेहद रूहानी रंग जो अब बेपर्दा होके हर ओर असर दिखाने लगे है , ढेर सारी खुशियाँ ,ढेर सारी मस्ती और ढेर सारा उत्साह समेटे इन पलों से आप भी गुजरिये ....देखिये बनारस की सबसे रंगीन तस्वीर जो यहाँ रंग भरी एकादशी के नाम से मशहूर है !!
श्री काशी विश्वनाथ दरबार में रंग भरी एकादशी .... आज गौना होता है गौरा पार्वती का , अपूर्ण श्रृष्टि को पूर्ण करने के लिए शिवरात्री को पार्वती से विवाह रचाने वाले शिव आज शक्ति को उनके पीहर से विदा करा कर अपने घर ले जाते हैं ! क्या संत-महंत, क्या घोंघा बसंत , रोज कमाने खाने वाले गिरहस्तों के भी चेहरे यूँ खिल जाते है ,जैसे खुशियों भरी हसरतों ने डेरा डाल रखा हो ! श्री काशी विश्वनाथ महंत जी के सजे धजे घर में चहल पहल है ,यही से तो महादेव और पार्वती की डोली उठती है ! भोलेनाथ सुबह से माता पार्वती के साथ अपने खास कमरे कोहबर में है ! ससुराल वालों में अखंड सौभाग्य की प्रतिक इस जोड़ी को विदाई भेंट करने की होड़ ,तो आँगन में पुरुषों के बाद अपनी बारी का इंतजार करती महिलायें ! कोई शिव गुण की महिमा बता कर शिव को रिझा रहा है तो कोई अपना राजा , अपना गुरु तो कोई खुद को शिव का गण साबित करने में लगा है ! जैसे काशी का कंकड़ कंकड़ सचमुच में शंकर है !
उधर खुद शिव के अवधूत स्वरूप मने जाने वाले नागा सन्यासि समूह में भी उत्सव का माहौल है ! यहाँ शिव पार्वती विवाह से लेकर गौने की बारात में भी शामिल होने की ख़ुशी, शिव के फक्कड़ मिजाज़ की तस्वीर पेश कर रही है ! हर हर महादेव के उद्घोष पे थिरकते नागा साधुओं की टोली ने सबसे पहले
अबीर गुलाल उड़ा के जनमानस में होली मनाने का संकेत देतें है ! यहाँ खुशियों की उड़ान ऐसी, जिसे देख आपभी सवाल करें की, कौन कहता है की सन्यासियों के जीवन में रंग नहीं होते ! जानकार बताते हैं की ...शिव भूत्वा शिव यजेती ....यानि आज के दिन सभी शिव के रंग में रंगे है !
धीरे धीरे पार्वती जी के ससुराल, यानि महादेव के घर विदा होने का वक्त आ जाता है ! फूल-माला साथ में वस्त्र-आभूषण से सजे संवरे दिगंबर शिव शंभू और पार्वती के रजत विग्रहों से सजी डोली,पार्वती जी के पिता यानि राजा हिमाद्री के घर से बाहर लायी जाती है ! फिर शुरू हो जाती है बाबा विश्वनाथ से हंसी ठिठोली और उनपे अबीर गुलाल और फूल उड़ाने की होड़, कोई किसी पे रंग नहीं लगता लेकिन सभी रंग जाते है,आसमान रंगीन हो जाता है !विग्रहों की आरती के बाद डोली के आगे बारात में शामिल डमरुओं और शहनाई की मंगल ध्वनी रोंगटे खड़े कर देने रूहानी माहौल में बदल जाती है ......या यूँ कहें की डोली के आगे जब इक्कीस विशाल डमरुओं की थाप संग, शहनाई की मंगल धुन ने संगत साधी तो ऐसा लगा मानो काशी के कंकड़ कंकड़ में हरकत होने लगी ..
बरों शंकर ,नहीं रहों कुँवारी .............माँ पार्वती का जन्मों जन्मों पुराना ये संकल्प आज पूरा हो रहा है इस ख़ुशी में शामिल हर शख्स होली की इस औचारिक शुरुवात के बाद बुढ़वा मंगल तक ऐसे ही फक्कड़ मस्ती में डूबा रहेगा ,बीच में होलिका जलेगी और होली भी खेली जाएगी .....अगर आप भी इस रूहानी माहौल में शामिल हुए तो जरुर कहेंगे की "जो रस बरस रहा काशी में , वो रस तीनो लोक में नाहीं ...
यह कैसी होली
अबकी बार की होली न जाने कब आई और न जाने कब गुजर गई। मैं था तो अपने ही शहर में फिर भी न जाने क्यों ऐसा लगता रहा कि किसी अजनबी माहौल में हूं। शाम के वक्त शहर की कई ऐसी जगहों पर गया जहां मैं पहले न जाने कितनी ही बार गया था लेकिन इस होली पर वही पुरानी जगहें न जाने क्यों नएपन का अहसास करा रही थीं। नयापन भी ऐसा जिससे किसी भी तरह का न तो रोमांच महसूस हो रहा था न तो खुद को उस माहौल से जोड पा रहा था। मेरा शहर बनारस अब बदल रहा है। कहते हैं कि यह दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर है। बाबा भोले की नगरी। इस शहर से ऐसा जुडाव रहा कि अपने कैरियर को किसी बडे शहर में परवान चढाने की बजाय यहीं रहने के लिए सबकुछ छोड आया था। लेकिन अब यहां पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा, दिन हो या रात यहां की तमाम जगहों से बेहद अपनापन महसूस करने की आदत अब खत्म हो रही है।
Sunday, December 18, 2011
बिग बॉस का घमासान
रियलटी शो के नाम पर एक बार फिर से दर्शकों में झुझलाहट पैदा करने वाला एक कार्यक्रम इन दिनों सुर्खियों में है। बिग बॉस का सीजन फाइव....फिलहाल का सबसे उबाउ और पकाउ शो जिसे देखने से मनोरंजन कम टेंशन अधिक होने लगा है। इस लक्जिरियस घर के हालात इतने बिगड चुके हैं कि पूछिए मत। यहां होने वाले झगडों ने झोपडपटटी को भी पीछे छोड दिया है। बिगडते हालात और घटती टीआरपी को देखते हुए ही इस शो को कुछ हद तक संभालने और प्रतिभागियों को एक तरह से चेतावनी देने के लिए एकाध दिन पहले घर में बगैर किसी जरूरत के अभिनेता सलमान खान की कुछेक मिनटों के लिए इंट्री कराई गई। यह गैरजरूरी इंट्री फिलहाल के लिए बेहद जरूरी हो गई थी। वजह साफ थी कि दिनभर का थका इंसान रात में जब टीवी के चैनलों को बदलता है तो वह ठहरता वहीं है जहां कुछ सुकून मिलने वाले प्रोग्राम आ रहे होते हैं। इसके उलट मौजूदा समय में बिग बॉस का रियलटी शो दर्शकों के लिए इरिटेटिंग हो गया था जिससे जाहिराना तौर पर शो के प्रायोजकों को भी झटके लगने लगे थे।
Monday, July 25, 2011
जवाब नहीं....
मैंने देखा,
दर्द से तडपते बूढे बाप को,
उनके आंसुओं में अपने आपको।
क्यों झेलता है वो रिश्तों के शाप को,
इंसान खो देता है रिश्तों में अपने आपको।
मैंने देखा है,
उनकी पथराई आंखों के सपनो को,
उनके भूले बिसरे अपनों को,
तिनका तिनका बिखरे अरमानों को,
तिल तिल के मरते स्वाभिमानों को।
मैंने देखा है,
जो निभातें हैं हर रिश्ते चुपचाप,
अपने लिए न रखते कोई हिसाब,
फिर भी उनकी इज्जत बेलिबास।
मैंने देखा है,
बाप के पसीनों से रिस्तों के लहू बनते,
उनके अरमानों तले परिवार के सपने सजते,
उस बाप के सपने भी पानी से बहते हैं,
जिस सपने और खून से हम बनते हैं।
मैंने देखा है,
दर्द से तडपते बूढे बाप को।
(अज्ञात रचनाकार का मर्म)
ज़िन्दगी का दरख्त
हो गया है ज़र्जर
समय की दीमक ने
कर दी हैं जड़ें खोखली
तनाव के थपेड़ों ने
झुलस दी है छाल
ख्वाहिशों के पत्ते
अब सूखने लगे हैं
और झर जाते हैं
प्रतिदिन स्वयं ही .
परिस्थितियों की आँधियाँ
उड़ा ले जाती हैं दूर
और जो बच जाते हैं
कहीं इर्द - गिर्द
उन पर अपनों के ही
चलने से होती है
आवाज़ चरमराहट की
उस आवाज़ के साथ ही
टूट जाती हैं सारी उम्मीदें
और ख़त्म हो जाती हैं
सूखी हुई ख्वाहिशे .
दर्द से तडपते बूढे बाप को,
उनके आंसुओं में अपने आपको।
क्यों झेलता है वो रिश्तों के शाप को,
इंसान खो देता है रिश्तों में अपने आपको।
मैंने देखा है,
उनकी पथराई आंखों के सपनो को,
उनके भूले बिसरे अपनों को,
तिनका तिनका बिखरे अरमानों को,
तिल तिल के मरते स्वाभिमानों को।
मैंने देखा है,
जो निभातें हैं हर रिश्ते चुपचाप,
अपने लिए न रखते कोई हिसाब,
फिर भी उनकी इज्जत बेलिबास।
मैंने देखा है,
बाप के पसीनों से रिस्तों के लहू बनते,
उनके अरमानों तले परिवार के सपने सजते,
उस बाप के सपने भी पानी से बहते हैं,
जिस सपने और खून से हम बनते हैं।
मैंने देखा है,
दर्द से तडपते बूढे बाप को।
(अज्ञात रचनाकार का मर्म)
ज़िन्दगी का दरख्त
हो गया है ज़र्जर
समय की दीमक ने
कर दी हैं जड़ें खोखली
तनाव के थपेड़ों ने
झुलस दी है छाल
ख्वाहिशों के पत्ते
अब सूखने लगे हैं
और झर जाते हैं
प्रतिदिन स्वयं ही .
परिस्थितियों की आँधियाँ
उड़ा ले जाती हैं दूर
और जो बच जाते हैं
कहीं इर्द - गिर्द
उन पर अपनों के ही
चलने से होती है
आवाज़ चरमराहट की
उस आवाज़ के साथ ही
टूट जाती हैं सारी उम्मीदें
और ख़त्म हो जाती हैं
सूखी हुई ख्वाहिशे .
Saturday, April 9, 2011
तहरीर चौक बनते बनते रह गया जंतर मंतर
अन्ना की आंधी में सबकुछ उडता दिखा। एक ओर केंद्र की सरकार उधियाई जा रही थी तो जनता की भावनाएं भी बेकाबू होकर अन्ना हजारे के समर्थन में काफिले दर काफिले जुडती दिखीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग और अनशन के तीसरे दिन जिस कदर जंतर मंतर पर लोगों की भीड उमडी ऐसा लगा कि बस मिस्र की तरह तख्ता पलटने के लिए लोग अनशन स्थल को ही तहरीर चौक में बदल देंगे। यह दीगर बात है कि लोगों के उमडने का यह सिलसिला सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बल्कि सभी राज्यों और सभी बडे शहरों में अपने शबाब पर था। बहरहाल एक बुजुर्गवार ने जिस तरह से देश के बच्चों से लेकर युवाओं और हमउम्रों में नई उर्जा का संचार किया था वह काफी हद तक स्वत: स्फूर्त प्रतिक्रिया थी। हर तरह से परेशान गरीब और मध्यमवर्ग इस आंदोलन का हिस्सा बनने से खुद को रोक न सका। अन्ना ने एक शुरुआत कर जैसे करोडों लोगों के दिल की बात को जुबान दे दी थी। नतीजा वही निकला जो निकलना था। लोग बेतहासा तरीके से आंदोलन के हमसफर बनने को बेताब दिखे। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों ने अनशन कर भ्रष्टाचार को उखाड फेंकने का संकल्प लिया। इन सबके बाद भी जब केंद्र सरकार ने अन्ना की सभी मांगों को मान लिया, और अनशन समाप्त करने के लिए अन्ना ने बच्ची के हाथ पानी पिया तो न जाने क्यों आम लोगों में जो शुकून की भावना दिखनी चाहिए थी नहीं दिखी। भ्रष्टाचार की बेल को पनपते वर्षों से देख रहे लोगों को यहां एक त्वरित परिणती चाहिए थी जो नहीं देखने को मिली। कुछ के जेहन को टटोलने की कोशिश की तो बात छनकर बाहर आई। कम से कम भ्रष्टाचार में लिप्त दो-चार केंद्रीय मंत्रियों का इस्तीफा ही हो जाता तो दिल को कुछ हद तक तसल्ली मिल जाती। खैर मांगें मानी गईं हैं तो सरकार मसौदा भी तैयार करेगी, संभवत: मानसून सत्र में जन लोकपाल विधेयक संसद में प्रस्तुत भी किया जाए लेकिन बार-बार ठगे गए जन को अब अपने तंत्र पर विश्वास नहीं रह गया है। न जाने सरकार कौन सा तिकडम करे और पूरे देश को ठगी का शिकार होना पडे। क्योंकि फिर से भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा माहौल बन पाए या न बन पाए। वजह यह कि इस देश में जनता को भरमाने के तमाम इंतजाम मौजूद हैं और प्रायोजित भी किए जाते हैं। खैर एक बात और जिक्र करने वाली है मेरे एक मित्र ने आज ही मुझे मेल के जरिए एक खूबसूरत और आलीशान बंग्ले की बाहरी और अंदरूनी तस्वीरें भेजी हैं। एक तरह से उसे भी कहीं से मिला था लिहाजा फारवर्ड करके मुझ तक इस अपील के साथ पहुंचाया गया कि इसे बढाते रहिए। जानते हैं दावा किया गया है कि उक्त तस्वीरें स्पेक्ट्रम महाराज राजा के अदभुत बंगले के बताए गए। देखकर आंखें चौंधिया गईं। जैसे लगा यूरोप के किसी अति धनाडय के घर को निहार रहा हूं। चाहूं तो उक्त्ा तस्वीरें यहां अटैच कर आपको भी दिखा दूं लेकिन ऐसा करुंगा तो तय मानिए मेरी तरह फ्रस्टेट हो जाएंगे, फिर एक बात और भी है जिसने मुझे ऐसा करने से रोका क्या पता वह बंगला किसी और का हो क्यों कि उसमें कहीं भी राजा नजर नहीं आए।
Sunday, February 20, 2011
चंद अहसास................
ये सर्द रात.....ये आवारगी....ये नींद का बोझ,
मैं अपने शहर में होता तो घर चला जाता........
.....................................
अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले यह तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे
कहकहा आंख का बर्ताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे
कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समंदर नजर आएं कैसे.......
.................................................................
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था,
तुम्हारे घर का सफर इस कदर तो सख्त न था
इतने मसरूफ थे हम जाने की तैयारी में,
खडे थे तुम और तुम्हे देखने का वक्त न था
मैं जिस खोज में खुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मरा ही अहसास तो कमबख्त न था
शराब कर के पिया उसने जहर जीवन भर,
हमारे शहर में उस जैसा कोई मस्त न था
गोपाल दास नीरज.........
मैं अपने शहर में होता तो घर चला जाता........
.....................................
अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले यह तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे
कहकहा आंख का बर्ताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे
कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समंदर नजर आएं कैसे.......
.................................................................
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था,
तुम्हारे घर का सफर इस कदर तो सख्त न था
इतने मसरूफ थे हम जाने की तैयारी में,
खडे थे तुम और तुम्हे देखने का वक्त न था
मैं जिस खोज में खुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मरा ही अहसास तो कमबख्त न था
शराब कर के पिया उसने जहर जीवन भर,
हमारे शहर में उस जैसा कोई मस्त न था
गोपाल दास नीरज.........
Monday, September 20, 2010
हंगामा है क्यों बरपा
हजारो साल पूरानी पांडुलिपियों से ले कर अब तक लिखी जाने वाली न जाने कितनी किताबो में ये साफ़ तौर पे लिखा गया कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ना करे लेकिन हमने सबक नहीं लिया। पूरी दुनिया में कई सालो से प्रकृति के साथ विभात्सा तरीके से खिलवाड़ किया जा रहा है जिसका अंत फ़िलहाल तो नहीं दिख रहा है। अलबत्ता अब कायनात कि तरफ से इंसानों को उनकी करनी का जवाब मिलने लगा है तो हंगामा बरपने लगा, भला ऐसा क्यों। अब गंगा का ही उदाहरण ले लीजिए। वो गंगा ही थी जिसके दोनों किनारों पे मानव सभ्यता ने हजारो सालो तक का सफ़र पूरा किया बल्कि समृद्धि और सुख पूर्वक कई पीढियों ने अपनी जिंदगी गुजारी। सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि अक्सर गुमान से लबरेज हो जाने वाले इंसानों कि मौजूदा पीढ़ी ने तरक्की और भविष्य कि योजनाओ कि आड़ लेते हुए टिहरी बांध का निर्माण कर डाला। चंद बरस ही गुजरे कि अब यही बाँध अब उत्तराखंड सी लेकर उत्तर प्रदेश के मैदानी भागो के लिए फजीहत का सबब बन गया। टीवी चैनेल से ले कर अखबारों कि सुर्खियों तक में बाँध में अधिक पानी होने पे उसे छोड़े जाने कि ही कि ही खबरों का दौर चल पड़ा है। तरह तरह से बताया जा रहा है कि यहाँ का इलाका बाढ़ से डूबेगा वहा के गांव डूबने वाले है। इसी टिहरी को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि कभी चीन या पाकिस्तान ने इसे निशाना बनाया तो भरी तबाही होगी। बहरहाल जब जो होगा वो तो तब होगा लेकिन पिछले कई सालो से तो पुरे गंगा के रास्ते में पड़ने वाले शहरो कि हालत खराब होती जा रही है। अभी बारिश है तो नदी में अथाह पानी दिख रहा है। वरना तो बाकि के समय में बिच गंगा में जहा तह फूटबाल के मैदानों सरीखे टापू उभरे नजर आते है। कम प्रवाह के चलते गंगा प्रदुसित होने का भी तमगा प् चुकी है जिसकी पवित्रता कि ऐसी ससन हुआ करती थी कि आज भी इंसान गंगा कि कसम बोलचाल में खाता रहता है। आज वही गंगा अपनी बाढ़ में सबको डुबो रही है तो इंसानी जमात कि साडी तरक्की धरी कि धरी दिख रही है। सायद किसी ने ठीक ही कहा है कि हम ही हम है तो क्या हम है, तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो.......
Tuesday, September 14, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)


















