Thursday, March 28, 2013
यह कैसी होली
अबकी बार की होली न जाने कब आई और न जाने कब गुजर गई। मैं था तो अपने ही शहर में फिर भी न जाने क्यों ऐसा लगता रहा कि किसी अजनबी माहौल में हूं। शाम के वक्त शहर की कई ऐसी जगहों पर गया जहां मैं पहले न जाने कितनी ही बार गया था लेकिन इस होली पर वही पुरानी जगहें न जाने क्यों नएपन का अहसास करा रही थीं। नयापन भी ऐसा जिससे किसी भी तरह का न तो रोमांच महसूस हो रहा था न तो खुद को उस माहौल से जोड पा रहा था। मेरा शहर बनारस अब बदल रहा है। कहते हैं कि यह दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर है। बाबा भोले की नगरी। इस शहर से ऐसा जुडाव रहा कि अपने कैरियर को किसी बडे शहर में परवान चढाने की बजाय यहीं रहने के लिए सबकुछ छोड आया था। लेकिन अब यहां पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा, दिन हो या रात यहां की तमाम जगहों से बेहद अपनापन महसूस करने की आदत अब खत्म हो रही है।
Sunday, December 18, 2011
बिग बॉस का घमासान
रियलटी शो के नाम पर एक बार फिर से दर्शकों में झुझलाहट पैदा करने वाला एक कार्यक्रम इन दिनों सुर्खियों में है। बिग बॉस का सीजन फाइव....फिलहाल का सबसे उबाउ और पकाउ शो जिसे देखने से मनोरंजन कम टेंशन अधिक होने लगा है। इस लक्जिरियस घर के हालात इतने बिगड चुके हैं कि पूछिए मत। यहां होने वाले झगडों ने झोपडपटटी को भी पीछे छोड दिया है। बिगडते हालात और घटती टीआरपी को देखते हुए ही इस शो को कुछ हद तक संभालने और प्रतिभागियों को एक तरह से चेतावनी देने के लिए एकाध दिन पहले घर में बगैर किसी जरूरत के अभिनेता सलमान खान की कुछेक मिनटों के लिए इंट्री कराई गई। यह गैरजरूरी इंट्री फिलहाल के लिए बेहद जरूरी हो गई थी। वजह साफ थी कि दिनभर का थका इंसान रात में जब टीवी के चैनलों को बदलता है तो वह ठहरता वहीं है जहां कुछ सुकून मिलने वाले प्रोग्राम आ रहे होते हैं। इसके उलट मौजूदा समय में बिग बॉस का रियलटी शो दर्शकों के लिए इरिटेटिंग हो गया था जिससे जाहिराना तौर पर शो के प्रायोजकों को भी झटके लगने लगे थे।
Monday, July 25, 2011
जवाब नहीं....
मैंने देखा,
दर्द से तडपते बूढे बाप को,
उनके आंसुओं में अपने आपको।
क्यों झेलता है वो रिश्तों के शाप को,
इंसान खो देता है रिश्तों में अपने आपको।
मैंने देखा है,
उनकी पथराई आंखों के सपनो को,
उनके भूले बिसरे अपनों को,
तिनका तिनका बिखरे अरमानों को,
तिल तिल के मरते स्वाभिमानों को।
मैंने देखा है,
जो निभातें हैं हर रिश्ते चुपचाप,
अपने लिए न रखते कोई हिसाब,
फिर भी उनकी इज्जत बेलिबास।
मैंने देखा है,
बाप के पसीनों से रिस्तों के लहू बनते,
उनके अरमानों तले परिवार के सपने सजते,
उस बाप के सपने भी पानी से बहते हैं,
जिस सपने और खून से हम बनते हैं।
मैंने देखा है,
दर्द से तडपते बूढे बाप को।
(अज्ञात रचनाकार का मर्म)
ज़िन्दगी का दरख्त
हो गया है ज़र्जर
समय की दीमक ने
कर दी हैं जड़ें खोखली
तनाव के थपेड़ों ने
झुलस दी है छाल
ख्वाहिशों के पत्ते
अब सूखने लगे हैं
और झर जाते हैं
प्रतिदिन स्वयं ही .
परिस्थितियों की आँधियाँ
उड़ा ले जाती हैं दूर
और जो बच जाते हैं
कहीं इर्द - गिर्द
उन पर अपनों के ही
चलने से होती है
आवाज़ चरमराहट की
उस आवाज़ के साथ ही
टूट जाती हैं सारी उम्मीदें
और ख़त्म हो जाती हैं
सूखी हुई ख्वाहिशे .
दर्द से तडपते बूढे बाप को,
उनके आंसुओं में अपने आपको।
क्यों झेलता है वो रिश्तों के शाप को,
इंसान खो देता है रिश्तों में अपने आपको।
मैंने देखा है,
उनकी पथराई आंखों के सपनो को,
उनके भूले बिसरे अपनों को,
तिनका तिनका बिखरे अरमानों को,
तिल तिल के मरते स्वाभिमानों को।
मैंने देखा है,
जो निभातें हैं हर रिश्ते चुपचाप,
अपने लिए न रखते कोई हिसाब,
फिर भी उनकी इज्जत बेलिबास।
मैंने देखा है,
बाप के पसीनों से रिस्तों के लहू बनते,
उनके अरमानों तले परिवार के सपने सजते,
उस बाप के सपने भी पानी से बहते हैं,
जिस सपने और खून से हम बनते हैं।
मैंने देखा है,
दर्द से तडपते बूढे बाप को।
(अज्ञात रचनाकार का मर्म)
ज़िन्दगी का दरख्त
हो गया है ज़र्जर
समय की दीमक ने
कर दी हैं जड़ें खोखली
तनाव के थपेड़ों ने
झुलस दी है छाल
ख्वाहिशों के पत्ते
अब सूखने लगे हैं
और झर जाते हैं
प्रतिदिन स्वयं ही .
परिस्थितियों की आँधियाँ
उड़ा ले जाती हैं दूर
और जो बच जाते हैं
कहीं इर्द - गिर्द
उन पर अपनों के ही
चलने से होती है
आवाज़ चरमराहट की
उस आवाज़ के साथ ही
टूट जाती हैं सारी उम्मीदें
और ख़त्म हो जाती हैं
सूखी हुई ख्वाहिशे .
Saturday, April 9, 2011
तहरीर चौक बनते बनते रह गया जंतर मंतर
अन्ना की आंधी में सबकुछ उडता दिखा। एक ओर केंद्र की सरकार उधियाई जा रही थी तो जनता की भावनाएं भी बेकाबू होकर अन्ना हजारे के समर्थन में काफिले दर काफिले जुडती दिखीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जंग और अनशन के तीसरे दिन जिस कदर जंतर मंतर पर लोगों की भीड उमडी ऐसा लगा कि बस मिस्र की तरह तख्ता पलटने के लिए लोग अनशन स्थल को ही तहरीर चौक में बदल देंगे। यह दीगर बात है कि लोगों के उमडने का यह सिलसिला सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बल्कि सभी राज्यों और सभी बडे शहरों में अपने शबाब पर था। बहरहाल एक बुजुर्गवार ने जिस तरह से देश के बच्चों से लेकर युवाओं और हमउम्रों में नई उर्जा का संचार किया था वह काफी हद तक स्वत: स्फूर्त प्रतिक्रिया थी। हर तरह से परेशान गरीब और मध्यमवर्ग इस आंदोलन का हिस्सा बनने से खुद को रोक न सका। अन्ना ने एक शुरुआत कर जैसे करोडों लोगों के दिल की बात को जुबान दे दी थी। नतीजा वही निकला जो निकलना था। लोग बेतहासा तरीके से आंदोलन के हमसफर बनने को बेताब दिखे। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों ने अनशन कर भ्रष्टाचार को उखाड फेंकने का संकल्प लिया। इन सबके बाद भी जब केंद्र सरकार ने अन्ना की सभी मांगों को मान लिया, और अनशन समाप्त करने के लिए अन्ना ने बच्ची के हाथ पानी पिया तो न जाने क्यों आम लोगों में जो शुकून की भावना दिखनी चाहिए थी नहीं दिखी। भ्रष्टाचार की बेल को पनपते वर्षों से देख रहे लोगों को यहां एक त्वरित परिणती चाहिए थी जो नहीं देखने को मिली। कुछ के जेहन को टटोलने की कोशिश की तो बात छनकर बाहर आई। कम से कम भ्रष्टाचार में लिप्त दो-चार केंद्रीय मंत्रियों का इस्तीफा ही हो जाता तो दिल को कुछ हद तक तसल्ली मिल जाती। खैर मांगें मानी गईं हैं तो सरकार मसौदा भी तैयार करेगी, संभवत: मानसून सत्र में जन लोकपाल विधेयक संसद में प्रस्तुत भी किया जाए लेकिन बार-बार ठगे गए जन को अब अपने तंत्र पर विश्वास नहीं रह गया है। न जाने सरकार कौन सा तिकडम करे और पूरे देश को ठगी का शिकार होना पडे। क्योंकि फिर से भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा माहौल बन पाए या न बन पाए। वजह यह कि इस देश में जनता को भरमाने के तमाम इंतजाम मौजूद हैं और प्रायोजित भी किए जाते हैं। खैर एक बात और जिक्र करने वाली है मेरे एक मित्र ने आज ही मुझे मेल के जरिए एक खूबसूरत और आलीशान बंग्ले की बाहरी और अंदरूनी तस्वीरें भेजी हैं। एक तरह से उसे भी कहीं से मिला था लिहाजा फारवर्ड करके मुझ तक इस अपील के साथ पहुंचाया गया कि इसे बढाते रहिए। जानते हैं दावा किया गया है कि उक्त तस्वीरें स्पेक्ट्रम महाराज राजा के अदभुत बंगले के बताए गए। देखकर आंखें चौंधिया गईं। जैसे लगा यूरोप के किसी अति धनाडय के घर को निहार रहा हूं। चाहूं तो उक्त्ा तस्वीरें यहां अटैच कर आपको भी दिखा दूं लेकिन ऐसा करुंगा तो तय मानिए मेरी तरह फ्रस्टेट हो जाएंगे, फिर एक बात और भी है जिसने मुझे ऐसा करने से रोका क्या पता वह बंगला किसी और का हो क्यों कि उसमें कहीं भी राजा नजर नहीं आए।
Sunday, February 20, 2011
चंद अहसास................
ये सर्द रात.....ये आवारगी....ये नींद का बोझ,
मैं अपने शहर में होता तो घर चला जाता........
.....................................
अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले यह तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे
कहकहा आंख का बर्ताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे
कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समंदर नजर आएं कैसे.......
.................................................................
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था,
तुम्हारे घर का सफर इस कदर तो सख्त न था
इतने मसरूफ थे हम जाने की तैयारी में,
खडे थे तुम और तुम्हे देखने का वक्त न था
मैं जिस खोज में खुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मरा ही अहसास तो कमबख्त न था
शराब कर के पिया उसने जहर जीवन भर,
हमारे शहर में उस जैसा कोई मस्त न था
गोपाल दास नीरज.........
मैं अपने शहर में होता तो घर चला जाता........
.....................................
अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले यह तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे
कहकहा आंख का बर्ताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे
कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा,
एक कतरे को समंदर नजर आएं कैसे.......
.................................................................
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था,
तुम्हारे घर का सफर इस कदर तो सख्त न था
इतने मसरूफ थे हम जाने की तैयारी में,
खडे थे तुम और तुम्हे देखने का वक्त न था
मैं जिस खोज में खुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मरा ही अहसास तो कमबख्त न था
शराब कर के पिया उसने जहर जीवन भर,
हमारे शहर में उस जैसा कोई मस्त न था
गोपाल दास नीरज.........
Monday, September 20, 2010
हंगामा है क्यों बरपा
हजारो साल पूरानी पांडुलिपियों से ले कर अब तक लिखी जाने वाली न जाने कितनी किताबो में ये साफ़ तौर पे लिखा गया कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ना करे लेकिन हमने सबक नहीं लिया। पूरी दुनिया में कई सालो से प्रकृति के साथ विभात्सा तरीके से खिलवाड़ किया जा रहा है जिसका अंत फ़िलहाल तो नहीं दिख रहा है। अलबत्ता अब कायनात कि तरफ से इंसानों को उनकी करनी का जवाब मिलने लगा है तो हंगामा बरपने लगा, भला ऐसा क्यों। अब गंगा का ही उदाहरण ले लीजिए। वो गंगा ही थी जिसके दोनों किनारों पे मानव सभ्यता ने हजारो सालो तक का सफ़र पूरा किया बल्कि समृद्धि और सुख पूर्वक कई पीढियों ने अपनी जिंदगी गुजारी। सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि अक्सर गुमान से लबरेज हो जाने वाले इंसानों कि मौजूदा पीढ़ी ने तरक्की और भविष्य कि योजनाओ कि आड़ लेते हुए टिहरी बांध का निर्माण कर डाला। चंद बरस ही गुजरे कि अब यही बाँध अब उत्तराखंड सी लेकर उत्तर प्रदेश के मैदानी भागो के लिए फजीहत का सबब बन गया। टीवी चैनेल से ले कर अखबारों कि सुर्खियों तक में बाँध में अधिक पानी होने पे उसे छोड़े जाने कि ही कि ही खबरों का दौर चल पड़ा है। तरह तरह से बताया जा रहा है कि यहाँ का इलाका बाढ़ से डूबेगा वहा के गांव डूबने वाले है। इसी टिहरी को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि कभी चीन या पाकिस्तान ने इसे निशाना बनाया तो भरी तबाही होगी। बहरहाल जब जो होगा वो तो तब होगा लेकिन पिछले कई सालो से तो पुरे गंगा के रास्ते में पड़ने वाले शहरो कि हालत खराब होती जा रही है। अभी बारिश है तो नदी में अथाह पानी दिख रहा है। वरना तो बाकि के समय में बिच गंगा में जहा तह फूटबाल के मैदानों सरीखे टापू उभरे नजर आते है। कम प्रवाह के चलते गंगा प्रदुसित होने का भी तमगा प् चुकी है जिसकी पवित्रता कि ऐसी ससन हुआ करती थी कि आज भी इंसान गंगा कि कसम बोलचाल में खाता रहता है। आज वही गंगा अपनी बाढ़ में सबको डुबो रही है तो इंसानी जमात कि साडी तरक्की धरी कि धरी दिख रही है। सायद किसी ने ठीक ही कहा है कि हम ही हम है तो क्या हम है, तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो.......
Tuesday, September 14, 2010
किसके राम

बड़ी हाय तौबा मची है भाई, फिर से नेताओ के दिन बहुरने वाले है। अयोध्या मसले में फैसले की घडी क्या आई लगे लोग कमर कसने। जिन्हें इस वक्त को भुनाना है उनकी तो वो जाने लेकिन अधिसंख्य जनता तो सहमी हुई है। लोगो को लगने लगा है कि न जाने क्या होगा। क्या पता फिर कितने दिनों तक का कर्फ्यू लगे, न जाने संभावित द्नागे में कितनी जाने जाये। असल तस्वीर जननी हो तो पता करिए कि सफ़र कि कितनी टिकटे और न जाने कितने काम को लोगो ने मारे डर के टाल दिया है। मगर हौवा खड़ा करने वालो को क्या फर्क पड़ता है। आखिर भगवन राम है किसके माहौल को भुनाने में लगे चंद मुठी भर लोगो के या उस अथाह जनसैलाब के जिनके मन मंदिर और आत्मा में न जाने कितनी पीढियों से रचे बसे पड़े है। ये निष्कर्ष हमें और आपको ही मिल के निकलना होगा।
Monday, June 22, 2009
trahimaam
क्षमाप्रार्थी हूँ मित्रों, काफी समय से अपने लिए ही वक्त नही निकल पा रहा था। अब चेता हूँ तो शायद ढर्रे पे लौट सकूँ। अख़बार की नौकरी के दौरान तो कालम दो कालम लिखना और उसे बेहतर बनने के लीये अनदाज़ और कलेवर तलाश लेना तो जैसे फितरत बन चुकी है लेकिन अपने ही ब्लॉग पे अपने ही मन की थोडी सी बातों को लिख पाना जैसे अपार लगता है। मुझ जैसे मेरे कुछ साथी भी हैं। सबसे निवेदन है की कुछ तो अपनी रचनाधर्मिता दिखाओ भाई। अगर मई भटकू तो मुझे भी टोको।
Tuesday, March 10, 2009
यहाँ तो प्रह्लाद भी जला दिए जाते हैं
एक अजीब दौर से गुजर रहे है होली मानाने वाले। आज की रात पुरे देश में होलिका दहन की गई। एक नए चलन के मुताबिक होने ये लगा है की होलिका के बिच होलिका और उसकी गोद में भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा भी राखी जाने लगी है। ऐसे में जब लोग होलिका जला रहे है तो प्रहलाद की प्रतिमा भी साथ जला दी जा रही है। जबकि मान्यता यही है की होलिका जल जाती है मगर प्रहलाद बचे रह जाते हैं। अब ऐसे में जो लोग होलिका दहन के पहले होलिका की गोद से प्रहलाद की प्रतिमा को हटा लेते है उनको तो कोटि कोटि प्रणाम लेकिन जो लोग ऐसा नही करते है उनको भगवान सद्बुधी दे।
Saturday, February 14, 2009
वैलेंटाइन डे
बडा ही अजीब चौकाने वाला अनुभव दे कर गया अबकी का वैलेंटाइन डे का महापर्व। यही आलम रहा तो इसके विरोध के बूते सालभर की खुराकी चलने वाले विरोधियों को अपने लिए कोई नया धंधा देखना पड़ेगा। इसमे तो किसी को संदेह नही रह गया है की प्रेम करने वालों ने वैलेंटाइन डे मनाया तो जरुर है। फ़िर ऐसा क्या हुआ की विरोधियों के हाथ कुछ लगा नही। तमाम शहरों में विरोध करने वालों की टोली निकली तो लेकिन ऐसा कुछ नही कर पाई की टीवी चैनल वाले उनके दीवाने हो उठे। कुछ एक शहरो में जो भी थोड़ा बहुत स्टंट देखने को मिला वो वही के लोकल माडिया और विरोधी संगठनों की मिलीजुली साजिश रही की ख़बर खड़ी हो जाए। लिहाजा थोड़ा बहुत कुछ देखने को मिला भी.
Thursday, February 12, 2009
saloni
न जाने अभी क्या क्या दिन देखने को मिलने वाले है। जिस कदर चैनल संस्कृति नै पीढी को गुमराह करने पर तुली है उससे ये कहना मुस्किल हो गया है की संस्कार नाम की विरासत बची रह पाएगी या नही। बात बहुत पुराणी नही हुई है इसलिए सबको याद भी होगा। आजकल एक रियलिटी शो में बच्चो के सहारे बड़ी उम्र के लोग अपनी फूहड़ता को परोसने में जुटे है। बच्चो में अगर कही तलेंट है तो उसका भी बंटाधार हो रहा है। नंबर और एस एम् एस के जारी जब से प्रत्भाओ के कद मापे जाने लगे तब से अर्थ का अनर्थ कुछ अधिक हो रहा है। एक कनेल पे आने वाले शो में पुणे की सलोनी नाम की बच्ची को कोई भला कैसे भूल सकता है जो अक्सर ही गंगू बाई के किस्से सुनती है। जी हाँ वही सलोनी जिसके मुह से सीधे कॉमेडी के नाम पे ऐसी फूहड़ता परोस्वाई जा रही है जिसने मुझ जैसे तमाम लोगो को ye सोचने पे मजबूर कर दिया है की इन बच्चो को भला क्यो बरबाद कर रहे है इनके घर वाले। अरे ऐसा तो कोई अपने सौतेले बच्चो के साथ नही करता। सबने गौर किया होगा की नन्ही सलोनी अपनी पुरी मासूमियत के साथ शो के स्टेज पे आती है। थोड़ा ठुमकती है और फ़िर सुरु हो जाती है उस स्क्रिप्ट का रत्ता लगाने जो उसके माँ बाप ने उसके लिए तैयार किया था। डेव के साथ इसलिए ये कह सकता हु क्योकि उस उम्र के बच्चो को नही पता होता की सलोनी क्या कहना चाहती है। कोमेडी में सलोनी बोलती है की मेरे पापा मुझसे बहुत प्यार करते है। हमेसा मझको पूछते रहते है। घर में होते है तो अक्सर पूछते है की सलोनी बेटा सो गई क्या, अधि रात में भी मम्मी से पूछते है की सलोनी बेटा सो गई क्या। सलोनी आगे सुनती है की पापा जब दिन में घर पे होते है तो अक्सर पैसे देकर बहार ये कहते हुए भेजते है की जा बेटा चकलेट खा के आ लेकिन एक घंटे से पहले मत आना। सलोनी ने अपनी पुरी मासूमियत से पुरी स्क्रिप्ट तो सुना दी लेकिन उसका सटीक मतलब उसको पता था न उसकी उम्र के और बच्चो को पता चला। अब चौकाने वाली बात ये है की फ़िर उस परफोर्मेंस पे जोरदार ठहाके और ढेरो खिलखिलाहट कहा से निकल रही थी। दिल पे हाथ रख के पूछिए हम सभी लोटपोट जा रहे थे। वह अपनी हिरिस को को एक बच्चे की तोतली आवाज़ से मिटने की एक बडिया तकनीक इजाद कर ली है हमने। अगर मई ग़लत नही हु तो इसी सो में ब्लड टेस्ट वाली भी एक कॉमेडी एक बच्चे ने सुने थी। वो बता है की एक बार वो हॉस्पिटल में अपने दोस्त से पूछता है की क्यो रो आरहे हो तो वह बताता है की ब्लड टेस्ट कराने आया था नर्स ने उंगली काट दी, फ़िर वो कहता है अच्छा है तुने बता दिया मई तो यूरिन टेस्ट कराने आया था। एक से बढ़ के एक परफोर्मेंस हो रहे है इन बच्चो के माँ बाप के अलावा की आले भी साथ होते है। एक से बढ़ के एक शो हो रहे है। लाफ्टर के एक शो में तो जजिंग करने वाले मर्दों के बिच बैठ के अपुरं सिंह तो द्विअर्थी चुटकुलों पे तो ऐसे ठहाके लगाती है की पूछिए मत।
बहार हाल जो भी चल रहा है जैसा भी चल राय थी नही है। मनोरंजन के पे फूहड़ता परोसे जाने का ये खेल बंद होना चाहिए। इसके लिए सर्जिम्मेदार विभागों को बिना किसी सिकायत के इंतजार किए ख़ुद आगे आकर कार्रवाई कानी चाहिए। इन सबके लिए अपसंस्कृति फैला रहे चनलो पे पाबन्दी तक भी लगे जनि चाहिए।
अब आपकी बारी... जय हिंद
बहार हाल जो भी चल रहा है जैसा भी चल राय थी नही है। मनोरंजन के पे फूहड़ता परोसे जाने का ये खेल बंद होना चाहिए। इसके लिए सर्जिम्मेदार विभागों को बिना किसी सिकायत के इंतजार किए ख़ुद आगे आकर कार्रवाई कानी चाहिए। इन सबके लिए अपसंस्कृति फैला रहे चनलो पे पाबन्दी तक भी लगे जनि चाहिए।
अब आपकी बारी... जय हिंद
Wednesday, February 11, 2009
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